"एक गांव की यादों से भरी कविता: अपने बचपन की यादें ताजगी से भरें"

"गांव के सुंदर वातावरण, दृश्यों एवं खेतों का फोटो"
 "एक गांव की यादों से भरी कविता: अपने बचपन की यादें ताजगी से भरें"
चल सपनों के छांव में

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में

जहां के पनघट तीर पर

वक्त ठहरता दो पहर


जहां ज़मीं पर आसमां

आ जाता है रात को

खलिहानों के मेढ़ पर

चांद टहलता प्रात को

सैर सपाटा कर रहे

सपने कागज़ नाव में

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में।


झूले झूले डाल पर

झूम रही अंगड़ाइयां

गलियों में गमगम करे

महुआ और अमराइयां

प्रात कूकती कोयलें

अरुणशिखा नित बांग दे

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में।


घर घर अपना कौन घर

भेद कहां मन जानता

हर आंगन के लाल हम

हर आंचल में है दुआ

होती है अनबन कभी

किंतु रमें सब प्यार में

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में।


नित्य पराती गूंजती

अरुणोदय सत्कार में

शाम का माथा चूमती

दीप जलाए हाथ में

इंद्रधनुष के तार सप्त

गड़े हुए जिस थाव में

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में।


जहां न जग का शोर है

जहां निखरता भोर है

जहां तसल्ली रात में

जहां हर्ष भी लोर है

बूढ़े बरगद पेड़ पर

बंधी उम्मीदें डोर से

चल सपनों के छांव में

उसी विहंगम गांव में।

✍✍✍

 रागिनी प्रीत

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